रविवार, 3 मई 2009

शब्द सलिला: बाल, / कंघा - अजित वडनेरकर

शब्द सलिला:
इस धारावाहिक स्तम्भ में श्री अजित वडनेरकर हमारा परिचय शब्दों के उद्भव तथा विकास की यात्रा से करा रहे हैं। भाषा सतत परिवर्तनशील होती है। शब्दों की अनेक सलिलायें मिलकर भषा-सागर को समृद्ध करती हैं। पाठक शब्दों की इस यात्रा से मन-रंजन के साथ ज्ञान-वर्धन भी कर सकेंगे। - सं।
बा ल संवारने का काम भी रोजमर्रा में उतना ही ज़रूरी है जितना सुबह उठकर नित्यकर्म निपटाना। बाल संवारने की क्रिया कंघे द्वारा सम्पन्न होती है। यूं इसके लिए बाल बाहना शब्द भी है जिसे उत्तर भारत में बाल भाना भी कहा जाता है पर यह मुख सुख के लिए होता है। असल शब्द है बाल बाहना जो बना है संस्कृत के वहनम् या वहनीयं से जिसमें ले जाने, सहारा देने, खोलने, सुलझाने से है।
बाल जब नहीं सुलझते हैं तब उन्हें कम करवाना पड़ता है। यूं उलझन जब हद से ज्याद बढ़ जाती है तो बाल नोचे भी जाते हैं, इस तरह गुस्से और खीझ का मुजाहिरा करने का रिवाज़ है। बाल संवारने में लोग काफी वक्त खर्च करते हैं मगर मूलतः बाल बाहने में यानी संवारने में बालों के उलझेपन को दूर करने का ही भाव है।
बालों का गुण ही होता है उलझना, गुत्थम-गुत्था होना। बाल अगर संवारे न जाएं तो वे जटा बन जाते हैं। जिनके सिर पर बड़ी बड़ी जटाएं होती हैं उन्हें इसीलिए जटिल कहा जाता है। बाद में कठिन, दुष्कर के अर्थ में जटिल शब्द चल पड़ा क्योंकि जटाओं को सुलझाना आसान काम नहीं होता। मूलतः जटिल का अर्थ होता है जटावत या जटायुक्त। सो बाल बाहने में उलझे हुए, बिखरे हुए बालों को सुलझा कर तरतीब देने का ही भाव है।
बालों की व्यवस्था से ही किसी के भी व्यक्तित्व के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। बिखरे बाल अस्तव्यस्तता की सूचना देते हैं। मनुष्य दिन में दस बार अपना चेहरा आईने में देखता है और हर बार दर्शनीय नजर आने के लिए सामान्यतौर पर बाल संवार लेता है। जाहिर है कि क्रियाशील रहते हुए अक्सर बाल ही बिगड़ते हैं, जो व्यक्तित्व के बारे में चुगली करते हैं। बाल संवारने के लिए दुनियाभर में दांतेदार उपकरण इस्तेमाल किया जाता है जिसे कंघा कहते हैं। कंघा बना है संस्कृत के कङ्कतः या कङ्कतिका से जिसका अपभ्रंश हुआ कंघा या कंघी। महाभारत के नायकों में एक युधिष्ठिर ने अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के यहां निवास करते हुए अपना नाम कङ्क (कंक) ही रखा था।
कंघे की दांतों जैसी संरचना की वजह से ही उसे कङ्क नाम मिला। कोंकणी में कंघे को दान्तोणी ही कहते हैं जबकि मराठी में उसे कंगवा कहा जाता है। अंग्रेजी का कॉम्ब शब्द भी भारोपीय भाषा परिवार से ही जन्मा है और उसके मूल में प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का गोम्भोस gombhos शब्द है।
बाल शब्द यूं तो संस्कृत में भी है मगर भाषा विज्ञानी इसे सुमेरी सभ्यता का शब्द मानते हैं। सुमेरी मूल से निकल कर बाल baal शब्द हिब्रू भाषा में समा गया जहां इसमें निहित सर्वोच्च जैसे भाव का अर्थविस्तार ग़ज़ब का रहा। इन्हीं अर्थों में एक अर्थ शीर्ष अर्थात सिर पर होने का भी रहा जिसकी वजह से इसे भी बाल नाम मिला। पौधे का सर्वोच्च सिरा बाली होती है, इसीलिए उसे यह नाम मिला। गौरतलब है हिब्रू में बाल का अर्थ है स्वामी, परमशक्तिवान, सर्वोच्च।
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